सत्येन्द्र दुबे केस: लूट और हत्या के केस में ३ को उम्रकैद (मार्च ६,७ २०१२, क्राइम पेट्रोल भाग ९९, १००)

Murder Of Civil Engineer Satyaprakash Chaubey - Episode 99 - 6th April 2012



Civil engineer Satyaprakash Chaubey was extremely dedicated and honest to his work. Satya was happy as he got a post of a project manager but at the same time he was tensed as he had to face several powerful people who will become a hurdle in his way. 3 unknown people brutally kills Satyaprakash outside Gaya Junction, Bihar on 27th November, 2003. Politicians and Builder were not at all happy with Satayprakash Chaubey as he was too honest and loyal with his work and corruption was at it's highest peak. Project Director P.S. Trivedi forces him to stay out of this matter. Satya was extremely upset with corruption. Who killed Satya Prakash? Will Honesty win or Corruption?



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Satyaprakash didn't gave up, he not only decided to gave promotion exams and departmental interview but also stood first in place and also succeeds in acquiring the position of project head in Koderma (head division), on the other side, Yadav, Trivedi and other members who were against Satayprakash Chaubey were worried as he will reveal the truth which was hidden from many years thus they plan to kill him and they succeed in killing an honest worker. His case spreads like fire in Media. Cops try to find Satyaprakash's killer. Will Cops succeed in finding Satyaprakash's killer?
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सत्येन्द्र कुमार दूबे का जन्म बिहार के सिवान जिले में हुआ था। वे भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में परियोजना निदेशक के पद पर कार्यरत थे। सत्येन्द्र दूबे द्वारा स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में व्याप्त भ्रष्टाचार को जनता के सामने लाये जाने के कारण उनकी हत्या 27 नवंबर 2003 में गया जिले में हो गई थी।



प्रारंभिक जीवन और शिक्षा



सत्येन्द्र के पिता का नाम श्री बागेश्वरी दूबे और माता का नाम श्रीमती फूलमती देवी था। उनका जन्म बिहार प्रांत के सिवान जिले के शाहपुर ग्राम में हुआ था। मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे सत्येन्द्र ने 15 वर्ष की आयु तक की अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में ही प्राप्त की और उसके बाद आगे की शिक्षा के लिए इलाहाबाद चले आए। इलाहाबाद में इनका विद्यार्थी जीवन बड़ा ही संघर्षपूर्ण था। इसके पश्चात 1990 में इन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के सिविल अभियांत्रिकी विभाग में प्रवेश लिया और 1994 में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में परास्नातक में प्रवेश लिया और यह परीक्षा सम्मान के साथ उत्तीर्ण किया। बचपन से ही सत्येन्द्र की गणना प्रतिभाशाली विद्यार्थियों में होती थी।



बाद का जीवन



सत्येन्द्र ने भारतीय अभियांत्रिकी सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण की जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें सन् 2002 में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में परियोजना निदेशक का पद मिला। इस पद पर काम करते समय उन्हें स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में कार्य करने का मौका मिला। इस परियोजना में कार्य करते समय उन्हें बहुत बडे़ स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमिताओं का पता चला। विभाग के ठेकेदारों और इंजिनियरों की साठ-गाठ से भ्रष्टाचार का धंधा खूब फल फूल रहा था। सत्येन्द्र ने अपने ही विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और इंजीनियरों के खिलाफ कार्यवाही की और उन्हें निलंबित किया।



भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष



सत्येन्द्र ने इसके बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहीम शुरू कर दी और अपने विभाग में हो रही दूसरी अनियमितताओं पर भी ध्यान केन्द्रित किया। उन्होंने इन अनियमितताओं के बारे में अपने विभाग के निदेशक और अन्य अधिकारियों को पत्र भी लिखा लेकिन किसी ने भी उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। इन शिकायतों के परिणाम स्वरूप उनका स्थानांतरण गया जिले में कर दिया गया। गया जिले में भी उन्होंने अपनी भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहीम में कोई कमी नहीं आने दी। सत्येन्द्र को इन सभी के फलस्वरूप धमकियां भी मिली।



A clip from Amir Khan's Satyamev Jayate





प्रधानमंत्री को पत्र



उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को देखते हुए सत्येन्द्र ने इसकी शिकायत प्रधानमंत्री से करने का निर्णय लिया और एक विस्तृत पत्र लिखा। उस गोपनीय पत्र में सत्येन्द्र ने भ्रष्टाचार पर विधिवत प्रकाश डाला और उसे प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दिया। भ्रष्टाचार की गंभीरता को देखते हुए सत्येन्द्र ने उस पत्र में अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया था। बाद में यह देखा गया कि सत्येन्द्र के अनुरोध के बाद भी कार्यालय अधिकारियों ने उस पत्र को सत्येन्द्र के नाम के साथ अलग अलग विभागों में अग्रसारित कर दिया।



सत्येन्द्र की हत्या



सत्येन्द्र की हत्या तब हो गई जब वे बनारस से एक विवाह समारोह के बाद घर लौट रहे थे। वे बनारस से गया तक ट्रेन द्वारा पहुंचे और उसके बाद गया स्टेशन से रिक्से द्वारा घर जाते समय रास्ते में गोली मार उनकी हत्या की गई। गया में जे.पी. कॉलोनी के रास्ते में उनका मृत शरीर पाया गया। सत्येन्द्र की मृत्यु ने लोक सभा तक को आंदोलित किया। देश में हो रहे विरोध प्रदर्शनों और सामान्य जनता के असंतोष को देखते हुए सरकार द्वारा उनकी मृत्यु की जांच केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दिया गया।



भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन



सत्येन्द्र की हत्या से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर एक भूचाल आ गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाली अन्य संस्थाओं ने इस मामले को उठाया। जिसके परिणामस्वरूप सरकार को नीतिगत स्तर पर भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले लोगों की पहचान सुरक्षित रखने का नियम बनाना पड़ा। सत्येन्द्र के बलिदान का एक यह सबसे बड़ा परिणाम हुआ कि सरकारी विभागों के भ्रष्ट अधिकारी इमानदार लोगों से डरने लगे। बाद के वर्षों में आया सूचना का अधिकार अधिनियम इस दिशा में मील का एक पत्थर साबित हुआ। यह नियम भ्रष्टाचार को उजागर वाले व्यक्तियों के लिए एक हथियार साबित हुआ।



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